Saturday, 1 October 2016

शहीद जवान के बच्चे की कविता दिल छू गई |

शहीद जवान के बच्चे की कविता दिल छू गई

ओढ़ के तिरंगा क्यों पापा आये है?

माँ मेरा मन बात ये समझ ना पाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

पहले पापा मुन्ना मुन्ना कहते आते थे,

टॉफियाँ खिलोने साथ में भी लाते थे।

गोदी में उठा के खूब खिलखिलाते थे,

हाथ फेर सर पे प्यार भी जताते थे।

पर ना जाने आज क्यूँ वो चुप हो गए,

लगता है की खूब गहरी नींद सो गए।

नींद से पापा उठो मुन्ना बुलाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

फौजी अंकलों की भीड़ घर क्यूँ आई है,

पापा का सामान साथ में क्यूँ लाई है।

साथ में क्यूँ लाई है वो मेडलों के हार ,

आंख में आंसू क्यूँ सबके आते बार बार।

चाचा मामा दादा दादी चीखते है क्यूँ,

माँ मेरी बता वो सर को पीटते है क्यूँ।

गाँव क्यूँ शहीद पापा को बताये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

माँ तू क्यों है इतना रोती ये बता मुझे,

होश क्यूँ हर पल है खोती ये बता मुझे।

माथे का सिन्दूर क्यूँ है दादी पोछती,

लाल चूड़ी हाथ में क्यूँ बुआ तोडती।

काले मोतियों की माला क्यूँ उतारी है,

क्या तुझे माँ हो गया समझना भारी है।

माँ तेरा ये रूप मुझे ना सुहाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

पापा कहाँ है जा रहे अब ये बताओ माँ,

चुपचाप से आंसू बहा के यूँ सताओ ना।

क्यूँ उनको सब उठा रहे हाथो को बांधकर,

जय हिन्द बोलते है क्यूँ कन्धों पे लादकर।

दादी खड़ी है क्यूँ भला आँचल को भींचकर,

आंसू क्यूँ बहे जा रहे है आँख मींचकर।

पापा की राह में क्यूँ फूल ये सजाये है,

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

क्यूँ लकड़ियों के बीच में पापा लिटाये है,

सब कह रहे है लेने उनको राम आये है।

पापा ये दादा कह रहे तुमको जलाऊँ मैं,

बोलो भला इस आग को कैसे लगाऊं मैं।

इस आग में समा के साथ छोड़ जाओगे,

आँखों में आंसू होंगे बहुत याद आओगे।

अब आया समझ माँ ने क्यूँ आँसू बहाये थे,

ओढ़ के तिरंगा पापा घर क्यूँ आये थे ।

Dil ko Chu jaye to share karna

sienna west - Imagens mais recentes
19.08.2015 23:30 IST
बहुत अँधेरा है कमरे में रौशनी कर दो..



बहुत अँधेरा है कमरे में रौशनी कर दो ,
उतार दो यह पैराहन, चांदनी कर दो .

चली भी आओ मैं जकड़ूँगा तुम को बाँहों से ,
मैं पीना चाहता हूँ आज बस निगाहों से .

दिखा के अपना हुस्न मेरे होश गुम कर दो ,
कि आज प्यार की पहली पहल भी तुम कर दो .

चले भी आओ तड़प के हमारी बाँहों में ,
कि अपनी सांस मिला दो हमारी सांसों में .

मेरे जलते हुए होठों पे अपने लब रख दो ,
उतार दो ये कपडे पलंग पे सब रख दो .

मैं अपने लबों को रख दूँ तेरे रुखसारों पे ,
और अपने हाथ फिराऊँ तेरे उभारों पे .

तुझे सर से पाँव तक मैं चूमता ही रहूँ ,
तेरे कंधे , तेरी छाती को चूसता ही रहूँ .

मैं चाहता हूँ छेड़ना तेरे तेरे अंगारों को ,
दबा के चूस के पी लूँगा इन उभारों को .

तेरा वोह अंग जो दुनिया में सब से प्यारा है ,
मैं उसे जीभ से चाटूं तेरा इशारा है .

फिरा के हाथ बदन पे मैं सज़ा दूँ तुझको ,
फिर अपनी जीभ से ज़न्नत का मज़ा दूँ तुझको .

मेरे लिए भी तो यह काम एक बार करो ,
मुंह में लेके चूसो इसे और प्यार करो .

फिर आओ इसके बाद एक हो जाएँ हम तुम ,
मुझे अपने बदन में पूरा समा लेना तुम .

और इस खेल में आखिर में वोह मुकाम आये ,
मेरे बदन में जो भी कुछ है तेरे काम आये .

चले आओ मेरी खुशियों को सौ गुणी कर दो ,
बहुत अँधेरा है कमरे में रौशनी कर दो . “”